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झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा
झारखंडी भाषाओं की एकमात्र त्रैमासिक प्रतिनिधि पत्रिका
वर्ष 6: महासम्मेलन विशेषांक, मार्च-मई 2010
- जो स्मृतियों में हैं - बोआ सीनियर
- मृत्यु जहां दबे पांव नहीं राष्ट्रीय दंभ के साथ आती है
- काला पानी के आदिवासी लड़ाके
- सरहुल पर्व का ऐतिहासिक सच
- खोरठा के अग्रदूत श्रीनिवास पानुरी
- संघर्ष ही एकमात्र विकल्प है
- हुलगुलान के शब्द, जो तारीखों में दर्ज हैं
- झारखंड का देशज-आदिवासी समुदाय
- भाषाई अस्मिता का आन्दोलन
- जनांदोलन और झारखंडी लेखक-संस्कृतिकर्मियों की भूमिका
- आदिवासी औरतों की दुनिया का सच
- आदिवासी-देशज जीवन दर्शन
- और झारखंड नवनिर्माण का दायित्व
- झारखंडी होने का मतलब
- प्राचीन भारत में वर्णव्यवस्था और भाषा
- उपेक्षित ही रहे हैं दलित
- झारखंडी भाषा-साहित्य: एक अंतरंग आकलन
- संविधान, सरकारें, नीतियाँ और देशज-आदिवासी भाषाएँ
- झारखंडी लिपियों का आत्मसंघर्ष
- आदिवासी और भारतीय शिक्षा व्यवस्था
- झारखंड का मौजूदा उर्दू साहित्यिक मंज़रनामा
- भूमि संबंधी विवाद और कानूनों का प्रभाव
- एक देश, अनेक राज्य और पहचान का संकट
- ऑपरेशन ग्रीन हंट इस लड़ाई में सिर्फ हार
- शोकगीत नहीं उल्लास का उत्सव
- ऑपरेशन ग्रीन हंटः औपनिवेशिक समय से आज तक
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