आदि धरम
लेखक: डॉ. रामदयाल मुण्डा/रतन सिंह मानकी
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली मूल्यः 600रु.
आदिवासी धरम पर यह अकेली पुस्तक है जिसे आदिवासी संस्कृति के विशेषज्ञ डॉ. रामदयाल मुण्डा और आदिवासी धरम के पारंपरिक विद्वान रतन सिंह मानकी ने लिखा है। इसमें आदि धरम के विभिन्न पहलुओं और सरहुल, करमा जैसे विभिन्न धारमिक परब-त्योहारों के विधि-विधानों एवं उनके मंत्रों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
झारखंड के आदिवासियों के बीच
एक एक्टीविस्ट के नोट्स
लेखकः वीर भारत तलवार
प्रकाशकः भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
पृष्ठः 692 मूल्यः 500/- रु.
झारखंडी विश्वदृष्टिकोण से रची गयी यह अपने ढंग की पहली और अनूठी पुस्तक है। यह एक गंभीर राजनीतिक विमर्श है तो सरस ललित साहित्य भी। समाजशास्त्रीय अध्ययन इसका एक उल्लेखनीय पहलू है तो इतिहास की परख अन्य विशेषता। जबकि कहानी, कविता और अपने समय की लाइव कमेंटरी इसे जानदार बनाती है। जो झारखंड आंदोलन के पुराने दौर के वैचारिक विमर्शों से परिचित नहीं हैं, उन सभी के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है। नवगठित झारखंड क्यों ऐसा है और राज्य बन जाने के बाद भी झारखंडी समाज की तकलीफों का अंत होता क्यों नहीं दिख पा रहा है, इसका स्पष्ट इशारा इस पुस्तक में है।

पेनाल्टी कॉर्नर (कहानी संग्रह)
लेखकः अश्विनी कुमार पंकज
प्रकाशकः प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन
पृष्ठः 126 मूल्यः 90/- रु.
‘पेनाल्टी कॉर्नर’ की कहानियाँ झारखंड के औपनिवेशिक शोषण-दमन और उससे उपजी सामाजिक-सांस्कृतिक विसंगतियों-विकृतियों को बेहद बारीकी से रेखांकित करती है। इनसे गुजरते हुए कई बार आँखों में आंसू आ जाते हैं, कई बार अनायास ही मुट्ठियां तन जाती हैं। राहत तब मिलती है जब इनके अनेक पात्र जुल्मों के खिलाफ तन कर खड़े हुए दीखते हैं। सही माने में माटी के दुसह दर्द के गहरे एहसास के बिना ऐसी रचनाएं संभव नहीं होती। झारखंड के जन-जीवन को संदर्भित करने वाली ऐसी रचनाएं और रचनाकार बहुत विरल हैं। हिंदी में तो और भी कम। दरअसल बहुत से रचनाकार यहां की जमीनी हकीकत से जुड़ ही नहीं पाते। संभवतः औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेष उन्हें ऐसा होने नहीं देते। ‘पेनाल्टी कॉर्नर’ की कहानियाँ अश्विनी कुमार पंकज को उन रचनाकारों से भिन्न पाँत में खड़ा करती हैं-एक शिखर की तरह, नैदिन गार्डीमर की तरह। |